“माँ दुर्गा ने खुद अपने बेटे की बलि क्यों दी? सच्चाई रोंगटे खड़े कर देगी!”

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हिन्दू धर्म में माँ दुर्गा को शक्ति, करुणा और न्याय का स्वरूप माना जाता है।वे केवल दुष्टों का नाश ही नहीं करतीं, बल्कि संसार की रक्षा के लिए स्वयं अपने प्रिय को भी त्याग सकती हैं।
ऐसी ही एक रहस्यमयी कथा है, जिसमें कहा गया है कि —
“माँ दुर्गा ने स्वयं अपने पुत्र की बलि दी थी।”
यह सुनकर कोई भी विचलित हो जाए, पर इसके पीछे जो आध्यात्मिक सच्चाई है, वह रहस्य और भक्ति दोनों से भरी है।
कौन था माँ दुर्गा का पुत्र?
पुराणों के अनुसार, देवी दुर्गा के कई रूप हैं — पार्वती, काली, चामुंडा, और भगवती।उनका एक रूप कात्यायनी देवी कहलाता है, जिनके पुत्र का नाम “केतु” बताया गया है।
केतु अत्यंत तेजस्वी और वीर थे, परंतु उनमें थोड़ा अहंकार आ गया था।वे सोचने लगे कि “मैं स्वयं माँ की शक्ति का अंश हूँ, इसलिए मुझे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं।”यहीं से प्रारंभ हुई वह कथा जो भक्ति को नए अर्थ में परिभाषित करती है।
जब अहंकार बना विनाश का कारण
एक बार असुरराज महिषासुर के वंशजों ने पुनः धरती पर उत्पात मचाया।देवताओं ने माँ दुर्गा से विनती की कि वे इस अधर्म का अंत करें।माँ ने जब युद्ध के लिए प्रस्थान किया, तो उनका पुत्र केतु भी साथ चल पड़ा।
परंतु केतु ने कहा —
“माँ, आप विश्राम करें, मैं अकेला ही इन दुष्टों का संहार कर दूँगा।”
माँ मुस्कुराईं। उन्होंने चेताया —
“बेटा, शक्ति तभी फलती है जब उसके साथ विनम्रता हो।”
लेकिन केतु ने नहीं सुना, और अहंकार में आकर युद्ध में गया।
दिव्य युद्ध और विनाश
केतु ने प्रारंभ में अनेक असुरों का संहार किया, परंतु धीरे-धीरे उसका अहंकार उसके विवेक पर भारी पड़ गया।उसने देवताओं पर भी आक्रमण कर दिया।
सारा ब्रह्मांड थर्रा उठा।तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव — तीनों देवताओं ने माँ दुर्गा से प्रार्थना की —
“हे जगतजननी! यदि आप ही उसे नहीं रोकेंगी, तो वह सृष्टि का संतुलन बिगाड़ देगा।”
माँ का कठिन निर्णय
माँ दुर्गा के लिए यह सबसे कठिन क्षण था।एक ओर उनका पुत्र था, और दूसरी ओर सृष्टि का धर्म।माँ ने आँखें बंद कीं, और स्वयं से कहा —
“यदि मेरी शक्ति सृष्टि के लिए है, तो मैं अपने पुत्र के प्रति मोह नहीं रख सकती।”
उन्होंने अपने सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया।
केतु ने माँ को देखकर कहा —
“माँ! आप मुझसे युद्ध करेंगी?”
माँ ने कहा —
“आज मैं माँ नहीं, सृष्टि की शक्ति हूँ।”
माँ दुर्गा द्वारा पुत्र की बलि
युद्ध प्रारंभ हुआ।केतु ने अपने दिव्य अस्त्र छोड़े, पर माँ दुर्गा की शक्ति असीम थी।अंततः माँ ने त्रिशूल उठाया और कहा —
“हे पुत्र! तेरे अहंकार का अंत अब इसी त्रिशूल से होगा।”
क्षणभर में ही त्रिशूल के वार से केतु का देह त्याग हुआ।परंतु अगले ही पल माँ ने उसके सिर को अपने हाथों में लेकर कहा —
“बेटा, यह मृत्यु नहीं — मुक्ति है। तू मेरे हृदय में सदा जीवित रहेगा।”
यही वह क्षण था जब माँ दुर्गा ने अपने बेटे की बलि देकर धर्म की रक्षा की।
इस कथा का रहस्य और अर्थ
यह कथा प्रतीकात्मक है।यह सिखाती है कि अहंकार चाहे अपने भीतर ही क्यों न हो, उसका अंत आवश्यक है।माँ दुर्गा का “पुत्र” वास्तव में हमारे भीतर की शक्ति का प्रतीक है,
और जब वही शक्ति अहंकार में बदल जाए, तो उसे नष्ट करना ही “बलिदान” कहलाता है।
“माँ दुर्गा की यह कथा हमें यह सिखाती है कि भक्ति का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार का वध करना है।”
माँ दुर्गा का सन्देश
माँ दुर्गा कहती हैं —
“जब शक्ति विनम्रता के साथ जुड़ती है, तभी संसार का कल्याण होता है।”
“अहंकार से शक्ति भी विनाश का कारण बनती है।”
इसलिए माँ ने हमें यह सन्देश दिया कि सच्ची शक्ति ममत्व त्यागने में नहीं, बल्कि सत्य के लिए खड़े होने में है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से “बलि” का अर्थ
“बलि” का अर्थ यहाँ शारीरिक हत्या नहीं, बल्कि अहंकार, लोभ और मोह का अंत है।माँ दुर्गा ने अपने भीतर के मोह की “बलि” दी ताकि सृष्टि धर्म पर स्थिर रह सके।इसीलिए उन्हें “धर्मसंस्थापक शक्तिरूपिणी” कहा गया है।
“जब माँ स्वयं अपने प्रिय का त्याग कर सकती हैं, तो हमें भी धर्म के लिए हर मोह छोड़ने का साहस रखना चाहिए।”
यह कथा कहाँ-कहाँ प्रचलित है
यह कथा मुख्यतः देवी भागवत पुराण और कुछ शाक्त तंत्र ग्रंथों में प्रतीकात्मक रूप से वर्णित है।राजस्थान, बंगाल और नेपाल के कई मंदिरों में “केतु बलि” की स्मृति में विशेष पूजा होती है,जहाँ माँ के आगे केवल दीपक और फूल अर्पित किए जाते हैं — कोई पशु नहीं।
मंत्र: माँ दुर्गा का आशीर्वाद पाने हेतु
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
यह मंत्र माँ दुर्गा की ऊर्जा को जागृत करता है और भीतर के अहंकार को समाप्त करता है।प्रातः काल 108 बार इसका जप करने से मन शुद्ध होता है।
निष्कर्ष
माँ दुर्गा की यह कथा केवल भय या चमत्कार की नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की है।उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्चा प्रेम वही है जो धर्म और सत्य के लिए त्याग करने की शक्ति रखता है।
हम सबके भीतर भी एक “केतु” है — जो कभी-कभी अहंकार में आकर हमें अंधकार की ओर ले जाता है।यदि हम माँ दुर्गा की तरह अपने भीतर के अहंकार की “बलि” दें, तो जीवन स्वतः ही दिव्य बन जाता है।
“माँ दुर्गा हमें सिखाती हैं — सच्चा बलिदान वही है, जिसमें स्वयं को जीतना पड़ता है।”
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